क्या आजकल के बच्चो को माता पिता की भावनाओ का अहसास है?

क्या आजकल के बच्चो को माता पिता की भावनाओ का अहसास है?क्या आजकल के बच्चो को माता पिता की भावनाओ का अहसास है?

माता पिता जिस तरह से अपने बच्चो का ध्यान रखते हैं उसे हम शब्दो मे बयान नही कर सकते हैं । खास तौर से जिस तरह से मॉए अपने बच्चो के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य खानपान या हर छोटा बड़ी बात का इतना ध्यान रखती है कि वो अपना खुद का ध्यान रखना भुल जाती है । मैने देखा है कई मॉओ को कि वो बच्चे का हर काम करके देती है । एक ऐसी भी मॉ मैने देखी है कि उसके 12 साल की एक बच्ची है वो उसका हर काम करके देती है । नहाने जायेगी तो उसे बाहर से टॉवल पकड़ायेगी । बाहर आने के बाद उसे कपड़े खुद पहनायेगी । खाना की प्लेट खुद लगा कर देगी । बाद मे प्लेट भी वो खुद उठा कर ले जायेगी । उसकी एक बड़ी बेटी जो कि 16 साल की है को तो कई बार अपने हाथों से खाना भी खिलाती है । वो अपनी दोनो बेटियों की हर जिद भी पूरी करती है । इसी मॉ की तरह मैने कई ऐसी माताये देखी है । पर वो ही बच्चे जब अपने मॉ बाप के छोटे मोटे के कामो मे हाथ बटाने मे पीछे रह जाते हैं । वे अपने माता पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी व जवाबदारी समझ नही पाते है ।

इसका कारण काफी हद तक माता पिता खुद होते हैं । बच्चो को अपने पर जरूरत से ज्यादा निर्भर करवाना और हर काम हाथ पर करके देना, अक्सर बच्चो को गैर जिम्मेदारी का विशेष कारण बन जाता है । बहुत जरुरी है कि माता पिता कुछ अहम कदम उठाये जिससे उनकी संतान न सिर्फ माता – पिता के लिए संवेदनशील बनेगी, बल्कि छोटे छोटे कामो के लिए आत्मनिर्भर भी बनेगी । ये खूबियां भविष्य मे उन्हें एक जिम्मेदार व्यक्ति के रूप मे भी गढ़ेगी ।

आईये आज हम विस्तार से ये जानने की कोशिश करते है कि किस प्रकार हम इस समस्या के बारे जाने और किस तरह हम इस समस्या का समाधान निकाले :

  1. घर के सब काम हो तो जाते हैं – घर के काम करने में, खाना बनाने, साफ-सफाई करने में मेहनत लगती है और समय भी। इन कामों में हाथ बंटाना तो दूर, बच्चे मां-पिता को काम करता देखकर, दूसरे कमरे में या बाहर चले जाते हे।

 गलती कहां होती है? – अमूमन मांएं बच्चों को हर चीज हाथ में देती हैं. उनके लिए थाली परोसकर देती हैं, उनके द्वारा घर मैं बिखेरे खिलौनों या अन्य सामान को समेटती हैं। और यहां तक कि उन्हें अपने हाथ से खाना भी खिलाती है और थाली भी उठाने नहीं देतीं। ऐसा करके वे जरूरत से ज्यादा अपने बच्चों को ख़ुद पर निर्भर बना लेती हैं।

क्या करना होगा – बच्चों में छोटे-छोटे कामों की आदत डालें। कुछ नियम बनाने होंगे जैसे कि स्कूल से आकर अपने जूते, यूनिफॉर्म, कार्ड, बैग, टिफिन, बॉटल, सभी वस्तु अपने स्थान पर उन्हें खुद रखनी हैं। कोई मेहमान आए तो पानी लेकर आना है। कोई खाना खा रहा हो तो उसको परोसने में मदद करना है। इसके अलावा घर के छोटे मोटे काम जैसे सब्जी – फल काटने, अलमारी जमाने या सजावट मे मदद करे । 

  1. बीमारी का अहसास भी नहीं

कुछ दिनों पहले मेरी दोस्त ने मुझसे एक आंखों देखा मंजर साझा किया। एक दिन जब वो अपनी सहेली से मिलने गई, तब वह बुखार और सिरदर्द से बेहाल थी। वो उसके 10 साल के बेटे को इस उम्मीद से देखती रही कि कुछ और नहीं तो वह अपनी मां को एक गिलास पानी का ही दे दे। पर वह मोबाइल गेम खेलने में व्यस्त रहा।..

  • गलती कहां हुई …

अभिभावक बच्चे से कह देते हैं कि तुम अपना कॉम करो, पानी हम ला देते हैं, मेहमान को हम देख लेंगे तुम खेलो या पढ़ाई करो। बच्चे को ‘अपना काम करने की हिदायत’ मिलती है, तो वह काम करने की जरूरत भी नहीं समझता।

  • क्या करना होगा….

दवाई लाना, घर में जो बीमार है उसकी फ़िक्र करना, सिर दबाना, बुजुर्गों के पैर दबाना या दवाई लगा देने जैसे काम बच्चों से करवाने से उनके मन में करुणा, संवेदनशीलता बढ़ेगी और वे जिम्मेदार बनेंगे।

  1. आप हर वक़्त जुटे रहते हैं…

माता-पिता को यह समझना जरूरी है कि जब तक आप खुद आपके लिए समय निकालना जरूरी नहीं समझेंगे, तब तक आपके बच्चे भी इसको आवश्यक नहीं मानेंगे.

  • ग़लती कहां होती है…

आप पूरे समय बच्चे की जरूरतों और अपनी घर- दफ़्तर की जिम्मेदारियों में जुटे रहकर तनावग्रस्त, रहते हैं। शरीर कमजोर होता जाता है और बच्चों को यह सब नजर नहीं आता। अक्सर गृहिणियां रविवार को पति के पीछे पड़ जाती हैं कि एक ही तो दिन मिलता है, तो बाहर चलना ही चाहिए। वे अपने पति की थकान के बारे में नहीं सोचतीं, तो बच्चों से क्या उम्मीद की जा सकती है।

  • क्या करना होगा..

अपने आराम का समय तय कर लें। ख़ासकर माताएं अपने आराम का ध्यान रखें। बच्चों को पता होना चाहिए कि मां-पापा के लिए भी आराम जरूरी है। हर रविवार बाहर जाने की बेजा जिद को बढ़ावा न दें। कामकाजी अभिभावक दफ़्तर से आकर कुछ समय आराम करें। अगर बच्चों को घुमाने ले जाना हो तो उनसे बात मानने और समय प्रबंधन की अपेक्षाएं स्पष्ट करें।

बच्चो मे संवेदनशीलता के और भी ज़रिए हैं:  

  • पालतू की देखभाल या बागवानी के जरिए भी बच्चे संवेदनशील बन सकते हैं। मूक प्राणी का ख़्याल रखते बच्चे अपने आप ही सबकी क़द्र करना सीख जाते हैं। उसी तरह पेड़-पौधों की देखभाल भी बच्चों को कर्त्तव्यनिष्ठ बनाती है।
  • आत्मनिर्भर होने का महत्व जान जाएंगे – बच्चे जब अपना काम ख़ुद करेंगे, तो उनका ख़ुद पर भरोसा बनेगा, जो उनके लिए भविष्य में लाभदायक • सिद्ध होगा। छुट्टियों में ददिहाल या ननिहाल जाने पर उनकी आत्मनिर्भरता. उन्हें शाबाशी दिलाएगी। खरी प्रशंसा आत्मविश्वास को पोषित करती है।
  • धमकाएं नहीं, बल्कि प्रोत्साहन दें – बच्चे आपकी बातें डर के कारण भी मानते हैं। इससे उनके मन में कभी भी खुद काम करने या मदद करने का भाव नहीं जागेगा। ऐसे में प्रोत्साहन सकारात्मक दवाई की तरह काम करता है। अगर बच्चा अपना काम पूरा करता है, तो उसको शाबाशी दें। कमी न निकालें, पर मार्गदर्शन करें।

उपरोक्त बिन्दुओ को अगर हम ध्यान मे  रखे  तौ बच्चे निश्चित ही माता पिता की भावनाओ की कद्र भी करेंगे और हमारी पीड़ा का अहसास भी उनको होगा।

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