ओलम्पिक खेलों की कल्पना के साकार होने की रोमांचक कहानी

ऐसा कहा जाता है हम जो भी आज देख रहे हैं, उसकी कल्पना किसी किसी व्यक्ति ने की तभी वो साकार हो सकी। सिर्फ कल्पना करने से ही कल्पनाएँ साकार नहीं होतीं उनके लिए धैर्य पूर्वक प्रयास भी आवश्यक है।  

आज में बताने जा रहा हूँ ओलम्पिक खेल का विचार कैसे साकार हुआ क्या क्या मुश्किलें सामने आयीं। इस लेख को पूरा पढ़ें और अपने मित्रों को शेयर भी करें। आपका ये छोटा सा प्रयास किसी का बड़ा सहारा बन सकता है।

फ्रांस में जन्मे पियरे डी कोबर्टीन की दिली तमन्ना थी, यूनान में प्राचीन काल में जिस तरह ओलंपिक की शुरुआत हुई थी, उसी तरह आधुनिक समय में फिर ओलंपिक शुरू हो, बचपन से ही पियरे डी कोबर्टीन को  खेलों में विशेष रुचि थी। उन्हें शुरू से ही लगता था कि खेलों में इतनी ताकत है कि यह लोगों को पास लाने में सहायक हो सकता है। सबसे बड़ी चीज यह कि खेल सारी दुनिया के देशों को एक जगह इकट्ठा कर तनाव को दूर करने में मदद कर सकता है। 

लेकिन सपने देखने भर से सपने पूरे नहीं होते हैं उनके लिए प्रयास भी करना होता है। पियरे डी कोबर्टीन का जन्म 1863 में फ्रांस में हुआ था। उन्होंने 29 वर्ष की आयू में ये विचार लोगों के सामने एक भाषण के दौरान प्रस्तुत कीं।

29 वर्षीय पियरे डी कोबर्टीन को लगता था कि चंद लफ्जों से मैदान मार लेंगे। खूब लच्छेदार भाषण पियरे डी कोबर्टीन ने तैयार किया था और यह सोचकर आये थे कि भाषण का अंत ऐसा जोरदार होगा कि तालियों की बौछार लग जाएगी। अनेक खेल अधिकारी व श्रोता पेरिस के उस सम्मेलन में मौजूद थे, जिनके बीच वह पियरे डी कोबर्टीन बोल रहे थे।

उन्होंने अपने भाषण में कहा ‘आइए हम नाविकों, धावकों और तलवारबाजों का निर्यात करें। यह भविष्य का मुफ्त व्यापार है और जिस दिन इसे पुराने यूरोप की चारदीवारी के अंदर पेश किया जाएगा, शांति को एक नया और शक्तिशाली समर्थन प्राप्त होगा।’

 अंत में, उन्होंने बहुत जोर देकर कहा था, ‘आपके इस सेवक को उम्मीद है कि आप उसकी मदद करेंगे, क्योंकि आपने उसकी अब तक की जीवन-यात्रा में बड़ी मदद की है और आपके साथ यह युवा आधुनिक जीवन के हालात के आधार पर इस अद्भुत कार्य को पूरा कर सकेगा। यह भव्य और सौहार्दपूर्ण महान कार्य है, ओलंपिक खेलों की बहाली।’

भाषण सुनकर तालियां बजने लगीं, लेकिन वैसी नहीं, जैसा सोचा था। लोग हर्षित होकर आगे आए, पीठ भी थपथपा गए, लेकिन जल्द ही आभास हो गया कि सब औपचारिकता निभा गए हैं। बात निकली तो सही , लेकिन मंजिल तक न पहुंची। 

पियरे डी कोबर्टीन ने सोचा था वह खेल अधिकारियों के सम्मेलन को संबोधित करेंगे और उनका सपना पूरा हो जायेगा।

व्यावहारिकता का पक्ष नजरंदाज हो गया। उसे उम्मीद थी कि उसके प्रस्ताव रखते ही सभी देश और अधिकारी सहमति में जयघोष करने लगेंगे। लेकिन किसी ने प्रस्ताव को आलोचना लायक भी नहीं माना।

दरअसल, अपनी कल्पना और भाषा के साथ पियरे डी कोबर्टीन इतने मुग्ध थे कि अपनी बात सहज शब्दों में समझा नहीं पाए। खेल अधिकारियों ने यही माना कि खेलों के आयोजन तो अभी भी हो रहे हैं, तो इस प्रस्ताव में नया क्या है ?

इस नाकामी का युवा पियरे डी कोबर्टिन पर गहरा असर हुआ। उस दौर में दुनिया के देश मौका मिलते ही एक-दूसरे पर चढ़ बैठते थे। कोबर्टिन यह सोचने के लिए मजबूर हुए कि प्रस्ताव रखने मात्र से बांत नहीं बनेगी। 

बात तब बनेगी, जब खेल अधिकारियों और खिलाड़ियों को यह समझाया जाएगा कि ओलंपिक क्यों जरूरी है। कोबर्टिन तैयारियों और आयोजन की योजनाओं पर ध्यान देने लगे। उन्होंने खेल अधिकारियों को अलग-अलग मिलने और समझाने में दो साल लगा दिए।

तब दुनिया मान युद्ध का मैदान थी। एक संगठन या एक आयोजन ऐसा नहीं था कि दुनिया के देश एक साथ मिल-बैठ सकें, कुछ कर सके। किसी के दिमाग में यह बात आई ही नहीं थी कि युद्ध और व्यापार के अलावा भी दुनिया में कुछ संभव है।

क्या एक ऐसा मंच नहीं होना चाहिए युद्ध की कोई बात न हो? क्या खेल का कोई ऐसा आयोजन नहीं होना चाहिए यूरोपही नहीं, दुनिया के तमाम देशों के दिखाज खिलाड़ी अपना कौशल आजमा सके ?कोबार्ट परस्पर लड़ते देशों को देखकर बेचैन हो उठते थे। 

उन्हें लगता था कि दुनिया एक साथ खड़ी न होकर महान भूल कर रही है। अमन-चैन ही नहीं, इंसानियत को कब्र  खोदी जा रही है। युवाओं को न खत्म होने वाले युद्ध में झोंका जा रहा है। बहुत मुश्किल समय था न हवाई जहाज बने थे, न देशों को परस्पर जोड़ने वाली सड़कें थीं। युद्ध घायल कर युवाओं को लौटा देता है, लेकिन ओलपिक युवाओं को मजबूत करके लौटाएगा।

युद्ध से अलग भी मेहनत करने और जीने की प्रेरणा मिलेगी। से लोगों को समझाने में कोबर्टिन ने दिन-रात एक कर दिया। दो साल बाद उन्हें खेल अधिकारियों को फिर संबोधित करने का मौका मिला और इस बार पहले आधुनिक ओलपिक आयोजन को बहुत आसानी से मंजूरी मिल गई। कोबर्टिन की कोशिशों से 21 महीने की तैयारी के बाद 6 अप्रैल, 1896 को इंसानों ने अपना नया इतिहास लिखना शुरू किया।

एथेंस, ग्रीस में ही सन 1896 में ओलपिक का आयोजन शुरू हुआ, जिसमें 14 देशों के 241 खिलाड़ियों ने कुल नौ खेलों में हिस्सा लिया। उस आयोजन के बाद ओलंपिक को ख्याति आसमान चढ़ती गई।

पिछले ओलपिंक 2016 में 204 देशों के लगभग 10,500 खिलाड़ियों ने 26 खेलों में भाग लिया था।

फादर ऑफ ओलंपिक के रूप में ख्यात कोबर्टिन का योगदान बेमिसाल है। वह सपनों की दुनिया से जब जमीनी तैयारी पर आए, तब दुनिया ने अंतरराष्ट्रीय मंचों का महत्व समझा और उसके बाद ही संयुक्त राष्ट्र संघ भी साकार हुआ।

जरा सोचिये यदि पियरे डी कोबर्टीन ने इस कार्य को प्राथमिकता नहीं दी होती तो क्या हम ओलम्पिक खेलों का आनन्द ले रहे होते| यदि आपको ये पोस्ट पसंद आई हो तो आप इस पोस्ट को शेयर अवश्य करें|

इस पोस्ट को पढने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

 

Ref: https://olympics.com/ioc/pierre-de-coubertin

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