ध्वनि प्रदूषण क्या है और इसके क्या दुष्प्रभाव है?

ध्वनि प्रदूषण क्या है और इसके क्या दुष्प्रभाव है?

ध्वनि मानव एवं जैव-मण्डल के अन्य जीवों के लिए प्रकृति की ऐसी देन है जिसके माध्यम से मानव सहित प्राणी अपने-अपने संदेशों का आदान-प्रदान करते हैं। ध्वनि ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा जीवों को खतरे का आभास होता है और वे खतरे से बचने के लिए सजग हो जाते हैं। ध्वनि प्राणियों के लिए मनोरंजन का एक साधन भी होता है। प्रातः काल पक्षियों का संगीतमय कलरव एक प्रकार से पक्षियों को आनन्द प्रदान करने का साधन है। इसी प्रकार मीठा स्वर या ध्वनि जैसे संगीत के यंत्रों से उत्पन्न ध्वनि या किसी संगीतज्ञ के गले से निकले स्वर बरबस सुनने वालों को अपनी ओर आकर्षित करते है तथा उनका मनोरंजन करते हैं। इसके विपरीत कर्कश ध्वनि सिरदर्द बेचैनी पैदा कर रक्तचाप के दबाव में वृद्धि कर देती है।

ध्वनि तथा शोर में अन्तर :

ध्यति विशिष्ट दाब तरंग होती है जो वायु में संचरण करती हुई उत्पत्ति स्थल से दूर स्थानों तक पहुँचती है वायु में ध्वनि तरंगों के संचरण पर ठोस या तरल अवयवो का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है लेकिन तरंगों की गति अवश्य प्रभावित होती है। इस दाब तरंग को जीवों के कानों में स्थित प्राप्त करने वाली यंत्र विधि द्वारा ग्रहण किया जाता है। इसी को श्रवण-शक्ति कहते हैं। प्रश्न उठता है कि ध्वनि तरंग की तीव्रता क्या है? ध्वनि तरंग की तीव्रता से आशय प्रतिक्षेत्र इकाई से होकर प्रति समय इकाई में ऊर्जा का प्रवाह है। ध्वनि तरंगे अपने उत्पत्ति केन्द्र से चारों दिशाओं में हवा में होकर गोलीय रूप में संचरण करती है। ध्वनि तरंगों में विशेषताएँ पायी जाती है –

(1) उत्पत्ति स्थल से दूरी बढ़ने के साथ-साथ ध्वनि तरंग की तीव्रता कम हो जाती है।

(2) ठोस वस्तु से टकराने पर ध्वनि तरम परावर्तित होती है।

(3) परावर्तन से तरंगों का प्रकीर्णन या विसरण होता है।

प्रश्न उठता है कि शोर क्या है?  शोर भी ध्वनि तरंग है लेकिन उच्च दाब एवं उच्च तीव्रता वाली ध्वनि को शोर कहते हैं। यह एक प्रकार से अवाछित आवाज होती है जिससे कार्यशील व्यक्ति की मानसिक स्थिति प्रभावित होती है और यह कार्य क्षमता को प्रभावित करती है। विल्सन के अनुसार “कोई भी आवाज जो उसे ग्रहण वाले के लिए अवांछित हो शोर कहलाती है” शोर  पर्यावरण प्रदूषण का एक रूप है। ध्वनि  का उच्च-स्तर शोर होता है । यह श्रवण क्षमता से भी अधिक होने से कर्णप्रिय नहीं होता है। फलस्वरूप इससे शरीर में अशान्ति व थकावट पैदा होती है।

ध्वनि प्रदूषण का अर्थ व परिभाषा :

जैसा कि उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि उच्च तीव्रता वाली ध्वनि जो कर्णप्रिय  नहीं होती है अर्थात जो अवांछित शोर के अन्तर्गत सम्मिलित की जाती है जिसके कारण व्यक्ति में बेचैनी पैदा हो जाती है,  ऐसी उच्च स्तर की आवाज को ध्वनि प्रदूषण कहते है। प्रायः देखने में आया है कि बड़े बड़े नगरों में लोहामंडी लोहे से सम्बन्धित वस्तुओं के क्रय -विक्रय का बाजार होता है। इस क्षेत्र में लोहे को काटने लोहे की चीजों को ट्रकों में चढ़ाने या उतारने पर इतना शोर होता है कि स्वस्थ व्यक्ति के सिर में दर्द होने लगता है। स्पष्ट है कि उच्च स्तर की ध्वनि जो अवांछनीय है. ध्वनि प्रदूषण कहलाती है। अतः कह सकते है कि ध्वनि प्रदूषण से पर्यावरण में पैदा होने उस असहनीय एवं अप्रिय शोरगुल से है जिसका स्वास्थ्य जीवनयापन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अनावश्यक असुविधाजनक और निरर्थक आवाज ही ध्वनि प्रदूषण है। यहाँ ध्वनि प्रदूषण के बारे में कुछ विद्वानों के द्वारा दी गई परिभाषाओं पर विचार करना उपयुक्त होगा

1. डा. वी. के राय के अनुसार अनिच्छापूर्ण ध्यान जो मानवीय सुविधा स्वास्थ्य व गतिशीलता में हस्तक्षेप या कुप्रभाव पैदा करे वह ध्वनि प्रदूषण है।

2. डेट वायलर के अनुसार हमारे पर्यावरण में शोर इस सीमा तक फैल जाय कि जन-सामान्य को क्षुब्ध या चिड़चिड़ा करने लगे तो उसे ध्वनि प्रदूषण कहते है।

Noise that permeates our environment to the extent that is irritates the general public may be termed “Noise Pollution”

3. ई. के मैक्सवेल के अनुसार वह ध्वनि जिसे कोई भी सुनना पसन्द नहीं करता है शोर कही जाती है। शोर पर्यावरण प्रदूषण का एक प्रकार है

Noise is any sound that is not wanted. It is one of the most common forms of atmospheric pollution.”

4. आई. जी साइमन्स के अनुसार अवांछित  और असुखद ध्वनि शोर है और उच्च स्तर का शोर ध्वनि प्रदूषण कहलाता है। Unwanted and unpleasant sound is called noise and a loud noise may be called noise pollution”

उपरोक्त परिभाषाओ के विवेचन के आधार पर सारांश रूप मे कह सकते हैं कि अवांछित, असुविधाजनक कर्ण कटु  ऊंची आवाज़ को ही ध्वनि प्रदूषण कह सकते है।

अब यह प्रश्न उठता है कि आवाज़ क्या है? आवाज़ ध्वनि प्रदूषण के एक विशिष्ट प्रदूषक के रूप मे है।

आवाज का जन्म प्राकृतिक और मानव जनित श्रोतों से होता है।

प्राकृतिक स्रोत-ध्वनि प्रदूषण के प्राकृतिक श्रोत्र निम्न लिखित है :

1। तेज गति से चलने  वाली वायु ।

2। जल प्रपात

3। बादलो की गड़गड़ाहट

4। बादलो से बिजली की कडक

5। ओला वृष्टि

6। तीव्र नदी जल जल प्रवाह

7। ज्वाला मुखी विस्फोट से उत्पन्न आवाज

मानव जनित ध्वनि प्रदूषण के सोत-

1। उद्योगों में उत्पन्न आवाज

2। नगरो  में कोलाहल

3। शादी आदि उत्सव पर शोर

4। आतिशबाज़ी  द्वारा उत्पन्न आवाज

5। खदानों में विस्फोट द्वारा चट्टानों को तोड़ना

6। परिवहन द्वारा उत्पन्न आवाज़

ध्वनि प्रदूषण के दुष्प्रभाव:

ध्वनि प्रदूषण केवल मानव को ही नहीं अपितु पशु-पक्षियों एवं निर्जीव वस्तुओं को भी प्रभावित करता है। मानव पर पड़ने वाले प्रभावों को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) श्रवण सम्बन्धी प्रभाव (2) सामान्य प्रभाव (3) शारीरिक प्रभाव (4) मनोवैज्ञानिक प्रभाव।

1. श्रवण सम्बन्धी प्रभाव – प्रत्येक मानव के स्वरतत्रिका होती है। स्वरतंत्रिका के दो भाग- कर्णावर्त तंत्रिका और प्रमाण तंत्रिका होते हैं। कर्णावर्त तंत्रिका का कार्य ध्वनि तरंगों को मस्तिष्क तक पहुँचाना होता है। तीव्र शोर के प्रभाव से यह तंत्रिका प्रभावित होती है जिससे श्रवण हास होता है। कभी-कभी तीव्र शोर से आंशिक या पूर्ण बहरापन आ जाता है। निम्न घटक श्रवण हास की मात्रा को प्रभावित करते हैं-(i) एक दिन में शोर सुनने की अवधि (1) शोर की आवृत्ति और तीव्रता (iii) शोर की बैंड चौडाई

2. सामान्य  प्रभाव : तीव्र ध्वनि से नींद मे बाधा पैदा होती है।  नींद पूरी न होने से व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है। शारीरिक शिथिलता आती  है। मानसिक कार्य करने का मन नहीं होता है। व्यक्ति कभी कभी व्याकुल ओर क्रोधी हो जाता है। ध्वनि प्रदूषण से एकाग्रता मे कमी आती है। ब्लड प्रेशर मे वृद्धि होती है जिसके कारण हृदय रोग हो सकता है।  शोर को सुनने पर गर्भवती महिलाओं में गर्भपात होने का डर रहता है।

3. शारीरिक प्रभाव – शोर के कारण उत्पन्न घबडाहट  के कारण हृदय की धड़कन तथा श्वास लेने की गति में वृद्धि होने लगती है। बहरापन होना सामान्य बात है। आँख की पुतलियों में खिचाव पैदा हो जाता है। पाचन तंत्र मे अव्यवस्था  के कारण पेट में अल्सर जैसी बीमारी पैदा हो सकती है। कुछ महिलाओं के पैदा होने वाले बच्चों में शारीरिक विकृतियों पैदा हो जाती है।

4. मनोवैज्ञानिक प्रभाव-उच्च ध्वनि मानव पर मनोवैज्ञानिक कुप्रभाव भी डालती है। इससे उनके आधार व्यवहार पर प्रभाव पड़ता है। उच्च स्तर के शोर के कारण व्यक्ति में झुंझलाहट खीज व चिडचिडापन आ जाता है।  उसकी मांसपेशियों में तनाव पैदा हो जाता है तथा नाड़ी तत्र उत्तेजित हो जाता है। मानसिक तनाव पैदा होने से भूलने की प्रवृत्ति होने लगती है। इन सभी का व्यक्ति की कार्यक्षमता पर प्रभाव पड़ता है।

व्यक्ति का आचरण भी उच्च स्तर की ध्वनि से प्रभावित होता है। उसमे एकाग्रता की कमी होने लगती है तथा किसी कार्य को करते समय घबडाहट अनुभव होती है। कुछ लोगों में आक्रामक सामाजिक व्यवहार के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

ध्वनि प्रदूषण रोकने के उपाय : 

यह सत्य है कि ध्वनि प्रदूषण में आजकल निरन्तर वृद्धि हो रही है। यद्यपि ध्वनि प्रदूषण का दुष्प्रभाव तत्काल दृष्टिगोचर नहीं होता है लेकिन इसका दूरगामी प्रभाव अवश्य होता है। अतः ध्वनि प्रदूषण के नियंत्रण के प्रयास अवश्य करने

चाहिए। इस सम्बन्ध में कुछ सुझाव निम्नलिखित है ।

1। वाहनों में तीव्र ध्वनि वाले हॉर्नो  पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।

2. अधिक ध्वनि पैदा करने वाले वाहनों में साइलेन्स लगाने चाहिए।

3 पुराने वाहन जो अधिक शोर करते हैं उनको सड़कों पर चलाने पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।

4। भारी वाहनों की आबादी वाले क्षेत्र में प्रवेश पर प्रतिबन्ध होना चाहिए।

5।  वाहनों के रख रखाव पर ध्यान देकर घटिया किस्म के ईंधन का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

6. नगर में यातायात की अच्छी व्यवस्था द्वारा भी ध्वनि प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

7। अधिक शोर करने वाले उद्योगों को बस्ती से दूर स्थापित करना चाहिए।

8। उद्योगी में लगी अधिक पुरानी मशीनों को बदलना चाहिए।

9। मशीनों के कलपुर्जों को अच्छी तरह ग्रीस लगाकर चिकना रखना चाहिए।

10 भवनों में ध्वनि अवशोषक पदार्थों का उपयोग करके तेज आवाज की कम किया जा सकता है।

11 श्रमिकों के लिए एयर प्लग का प्रयोग अनिवार्य कर देना चाहिए।

12 पेड़-पौधे ध्वनि की तीव्रता को कम करते हैं। अत घरो विद्यालय अस्पताल कारखानों के आस-पास तथा सड़क के सहारे अधिक वृक्ष लगाने चाहिए। वृक्ष 10 डेसीबल तक ध्वनि की तीव्रता को कम करते है।

13।  हवाई अड्डों पर शोर कम करने के लिए वैज्ञानिकों की शोध करना चाहिए।

14 घरेलू उपकरणों जैसे-टीवी पंखे  कूलर रेडियो आदि की समय-समय पर मेकेनिक  से जाँच करवानी चाहिए।

15।  यातायात पुलिस को उच्च स्वर में हार्न बजाने वाले को दण्डित करने का कानून बनाना चाहिए।

16। वन तथा पर्वतों पर विस्फोटकों के प्रयोग पर रोक लगानी चाहिए।

17।  विद्यालयों में छात्रों को शोर से होने वाली हानियों का ज्ञान कराकर ध्वनि प्रदूषण रोकने के प्रति उचित दृष्टिकोण पैदा करना चाहिए।

18. विद्यालय में चिकित्सक को बुलाकर उससे ध्वनि के दुष्प्रभावों पर वार्ता का आयोजन करवाना चाहिए।

19।  नागरिकों में चेतना पैदा करने के लिए छात्रों की ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण रैली निकालने का आयोजन करना चाहिए।

20।  शिक्षक व छात्रों को मिलकर विद्यालय के प्रागण में वृक्षारोपण करना चाहिए।

21। सामाजिक संस्थाओ जेसे लायन्स क्लब, रोटरी क्लब, महावीर इन्टरनेशनल को आगे बाद कर ध्वनि प्रदूषण से संबधित सेवा कार्य करने चाहिए।

1 Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.

© 2022 Bigfinder - WordPress Theme by WPEnjoy